चीन को अपना बाजार सौंपने के बजाय क्यों न हम अपने देश के परिवारों का ही आर्थिक सहारा बनें?

करोड़ों रुपए का व्यापार चीन जैसे देशों को सौंपने के बजाय क्या हम अपने देश के परिवारों को आत्मनिर्भर नहीं बना सकते हैं? ऐसे ही प्रश्न उठाती भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी…

साभार यशा माथुर

देश की रक्षा दूसरों के हाथ में क्यों दें: राखी का त्योहार आने को है और देश में फैंसी चीनी राखियों की जगह परंपरागत रक्षासूत्र बांधने का अभियान आगे बढ़ रहा है। इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बढ़ता कदम बताते हुए भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने खुद राखियां बनाकर मुहिम शुरू की है। रक्षासूत्र का महत्व बताते हुए वह कहती हैं, रक्षासूत्र में शब्द ही रक्षा है।

देश की रक्षा, देश की सुरक्षा, इसकी आर्थिक नीतियों की रक्षा, अर्थव्यवस्था की रक्षा, बहनों की रक्षा, भाई की रक्षा। यह रक्षासूत्र तो रक्षा का बंधन है जिसमें बहन अपने भाई की, स्वयं अपनी, अपने परिवार की रक्षा की कामना कर रही है। जब हम ऐसा कर रहे हैं तो हम देश की रक्षा और सुरक्षा को दूसरों के हाथ में दे सकते हैं? जवाब है नहीं। इसी रक्षा का एक अर्थ है आर्थिक व्यवस्था की रक्षा।

हम खुद बना सकते हैं राखी: मीनाक्षी लेखी कहती हैं कि इस परंपरागत त्योहार में दिखावे की कोई जरूरत नहीं है। वह कहती हैं, यह एक सादा सा त्योहार है, लेकिन इसका महत्व बहुत गहरा है। इस त्योहार में दिखावे की जगह नहीं है। इसमें तो एक सादा सा सूत्र भी बांधा जा सकता है। आप मौली ले लीजिए, रेशम का धागा ले लीजिए। घर में उपलब्ध मोती या रूद्राक्ष को पिरोकर राखी बना लीजिए, जो चीजें भारतीय परंपरा की हैं उन्हें लेकर राखी तो हम खुद ही बना सकते हैं। इसके लिए हमें किसी दूसरे देश की राखी की क्या जरूरत है? ज्यादा से ज्यादा लोगों को देसी चीजें प्रयोग कर राखियां खुद ही बनानी चाहिए।

600 करोड़ का धंधा है: चीन को अपना बाजार सौंपने के बजाय क्यों न हम अपने देश के परिवारों का ही आर्थिक सहारा बनें? इसी तर्ज पर मीनाक्षी प्रश्न उठाती हैं कि 600 करोड़ का धंधा है राखियों का और यह पैसा देश से बाहर क्यों जाए? जबकि हमारे अपने देश में बहुत सारे परिवार भूखों मर रहे हैं। अगर राखी के बहाने ये परिवार कुछ कमा लें तो क्या बुराई है? मेरी महिला मोर्चा की बहनों ने राखियां बनाई हैं जिन पर कोरोना योद्धा और स्वदेशी जैसे शब्द लिखे हैं। आइडिया यह है कि किसी गरीब परिवार का पालन-पोषण हो। हमें इसका प्रचार करना चाहिए और अपनी परंपरा को अपनाना चाहिए। राखी बाहर से नहीं आनी चाहिए।

धागा ही तो बांधना है: चीन से आने वाली फैंसी राखियों में प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है। इसकी जगह साधारण मौली में हम घर से कुछ भी लगा सकते हैं। ऐसा मानते हुए वह कहती हैं कि सादा धागा ही बांध दो। हमने तो छोटे-छोटे लकड़ी के टुकड़े बनवाए हैं। मैं अपने घर पर राखी बनाने का सामान लेकर आई हूं और खुद राखी बना रही हूं। घर में सबसे बात करते-करते भी मैं राखी बना लेती हूं। इसमें धागा ही तो बांधना है और मोती पिरोना है। हम इसमें सक्षम हैं इसे तो हमें खुद ही कर लेना चाहिए। इसके लिए भी हम विदेश पर क्यों निर्भर रहें? साधारण सा विषय है यह आत्मनिर्भर होने का।